'ख़ुदा सही सलामत है' उपन्यास में नारी संघर्ष
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Abstract
रवीन्द्र कालिया साठोत्तरी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार के रूप में जाने जाते हैं । 'ख़ुदा सही सलामत है' उपन्यास में नारी के सामाजिक स्थिति को बहुत ही मार्मिकता के साथ स्त्री शोषण एवं उसके संघर्ष को दशार्या है । भारतीय समाज में स्त्री का सामाजिक एवं पारिवारिक रूप से कैसे शोषण होता है और समाज में स्त्री अपने गौरव एवं सम्मान के लिए कैसे संघर्ष करती है, जैसे की उपन्यास का पात्र अज़ीज़न एक तवायफ़ होते हुए भी अपनी पुत्री का जीवन एक सामान्य युवती के समान ही समाज में गौरव के साथ उसका विवाह करने की अपेक्षा रखती है । भारतीय नारी को परिवार में मात्र पति से ही नहीं बल्कि समाज में अन्य लोगों के द्वारा भी अनेक यातनाएँ सहनी पड़ती है और साथ में वह भी सामान्य लोगों की तरह ही एक गौरवमय जीवन जीने का संघर्ष करती है ।
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References
व्होरा आशारानी, भारतीय नारी, दशा और दिशा, पृ 13 नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1983
'ख़ुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 57
'खुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 19
'ख़ुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 29
'खुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 62
'ख़ुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 257
'ख़ुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 111
'खुदा सही सलामत है' रवीन्द्र कालिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 2019 पृ.सं 217