बंजारा (लम्बाणी) वेशभूषा: सांस्कृतिक एवं रक्षात्मक विमर्श

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डॉ. राजशेखर उमेश जाधव

Abstract

प्रस्तुत शोध-लेख बंजारा (लम्बाणी) समुदाय की वेशभूषा और आभूषणों का एक नृवंशवैज्ञानिक (Ethnographic) और सांस्कृतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेख का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि इस समुदाय का पहनावा मात्र सौंदर्यपरक अलंकरण नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक संघर्षों, भौगोलिक विस्थापन और आत्मरक्षा की प्रवृत्तियों का परिणाम है। शोध के माध्यम से बंजारा लोक गीतों में निहित सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों को रेखांकित किया गया है। साथ ही, वेशभूषा के विभिन्न अंगों जैसे-शीशा कार्य (Mirror work), भारी आभूषण और गोदना (Tattoo) के पीछे छिपे सुरक्षात्मक और सामाजिक कारणों का गहन &मौलिक विश्लेषण* किया गया है। निष्कर्षतः, यह लेख बंजारा संस्कृति को मुख्यधारा के साहित्य में एक &दृश्य* के बजाय एक &दर्शन* के रूप में स्थापित करने की वकालत करता है।

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Author Biography

डॉ. राजशेखर उमेश जाधव

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, विश्व भारती प्रथम दर्जा महाविद्यालय, तुरनुर.

How to Cite

राजशेखर उमेश जाधव. (2026). बंजारा (लम्बाणी) वेशभूषा: सांस्कृतिक एवं रक्षात्मक विमर्श. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 15(03), 106 to 112. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/2042

References

इंदुमती लमाणी, बंजारा स्त्रीयर वस्त्राभरण, वाग्जाई प्रकाशन विजयपुर, 2018, पृ. 26-27

डॉ. पी. के. खंडोबा, कर्नाटकद, लंबाणीगलु वंदु सांस्कृतिक अध्ययन, प्रकाशन - दि. तेजसिंग राठोड़ मेमोरियल ट्रस्ट, गुलबर्गा, 1991, पृ. 4

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डॉ. डी. बी नायक, लंबाणी संस्कृति, कर्नाटक साहित्य अकादमी बंगलूरू, 1994, पृ. 25

डॉ. पी. के. खंडोबा, कर्नाटकद, लंबाणीगलु वंदु सांस्कृतिक अध्ययन, प्रकाशन - दि. तेजसिंग राठोड़ मेमोरियल ट्रस्ट, गुलबर्गा, 1991, पृ. 65

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