समकालीन हिन्दी नाटक और सत्ता-विमर्श: कौटिल्यीय सप्तांग सिद्धांत के आलोक में एक विश्लेषण
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Abstract
साहित्य और समाज का संबंध सदैव अन्योन्याश्रित रहा है, जहाँ नाटक अपनी दृश्य-श्रव्य प्रकृति के कारण सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियों को सर्वाधिक प्रखरता से अभिव्यक्त करता है। 21वीं सदी का हिन्दी नाटक वैश्वीकरण, बाज़ारवाद और जटिल राजनैतिक परिवेश के बीच सत्ता की बदलती प्रवृत्तियों को रेखांकित कर रहा है। आचार्य कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य के सुचारू संचालन हेतु ‘सप्तांग सिद्धांत’ (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र) का प्रतिपादन किया था, जो सदियों तक सत्ता-संरचना का आधार बना रहा।
प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य कौटिल्यीय सप्तांग सिद्धांत के निकष पर 21वीं सदी के चयनित हिन्दी नाटकों में सत्ता-संरचना के विखंडन का विश्लेषण करना है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभ और सत्ता के पारंपरिक अंग क्षरित हो रहे हैं, तब नाटककार इन प्राचीन सिद्धांतों के टूटने और उनके नए, विकृत रूपों को रंगमंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। शोध पत्र इस बात की पड़ताल करता है कि आधुनिक नाटकों में ‘स्वामी’ (शासक) की नैतिकता, ‘अमात्य’ (प्रशासन) की कार्यकुशलता और ‘जनपद’ (जनता) की स्थिति कौटिल्य के आदर्शों से किस प्रकार विमुख हुई है।
विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि समकालीन नाटक सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध एक प्रति-विमर्श खड़ा करते हैं। यह अध्ययन न केवल साहित्यिक प्रवृत्तियों को समझने में सहायक है, बल्कि सत्ता और समाज के द्वंद्वात्मक संबंधों पर एक नवीन सांस्कृतिक दृष्टि भी प्रदान करता है। निष्कर्षतः, यह शोध पत्र पारंपरिक राजनैतिक दर्शन और आधुनिक नाट्य-चेतना के बीच एक तुलनात्मक सेतु स्थापित करने का प्रयास है।
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