भक्तिकाल और आधुनिक साहित्य का समन्वय
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Abstract
भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली युग रहा है। भक्तिकालीन साहित्य ने भारतीय समाज में आध्यात्मिकता, समता, मानवतावाद और सामाजिक सुधार की चेतना को जन्म दिया, जिसका गहरा प्रभाव आधुनिक साहित्य पर देखा जा सकता है। भक्तिकालीन साहित्य 14वीं सदी से 17वीं सदी तक माना जाता है। आधुनिकता सामान्यतः तर्कशीलता, व्यक्तिवाद, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी होती है। भक्तिकालीन साहित्य केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, अपितु आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है और साथ ही मार्गदर्शन भी करता है। जिस युग में यह साहित्य रचा गया, वह सामाजिक असमानता, धार्मिक कट्टरता और नैतिक पतन का समय था और आज वर्तमान में भी वही समस्याएँ कई रूपों में विद्यमान हैं। ऐसे में भक्तिकालीन संत कवियों की विचारधाराएँ आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखती हैं।
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References
हिन्दी साहित्य की युग और प्रवृत्तियाँ - डॉ. शिवकुमार शर्मा
हिन्दी साहित्य का इतिहास - हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
भक्ति आंदोलन का सामाजिक स्वरूप - रामकुमार वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
हिन्दी साहित्य का इतिहास - रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी