हिन्दी उपन्यास साहित्य में किन्नर विमर्श
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समकालीन समाज का दर्पण है आज का साहित्य। हमारा देश विश्व में सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है। यहाँ कई समुदाय के लोग निवास करते हैं। समुदाय का अर्थ एक ऐसे समूह से है जहाँ लोग निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में एक साथ रहते हैं। आपस में सामाजिक संबंध रखते हैं उनमें &हम* की भावना (सामुदायिक भावना) होती है। उनकी एक जैसी संस्कृति एक जैसा रहन-सहन, खान-पान, भाषा-बोली, वेश-भूषा होती है। अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति समुदाय के भीतर ही पूरी कर लेते हैं। ये लोग अपने समुदाय के प्रति वफादार होते हैं और सामुदायिक नियमों का परिपालन भी करते हैं। भारतीय समाज में सभी समुदायों की स्थिति एक जैसी नहीं होती है। आज भी वर्ग और वर्ण के आधार पर समुदायों की स्थिति एक जैसी नहीं होती है। आज भी वर्ग और वर्ण के आधार पर समुदायों का विभाजन किया जाता है। यह सामान्य जीवन साझा संस्कृति और सहयोग पर आधारित होता है।
हिन्दी उपन्यास आधुनिक गद्य साहित्य की एक प्रमुख विधा है, जिसमें जीवन की व्यापकता और जटिलता को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के दौर में हिन्दी उपन्यास ने समाज के उन वर्गों को केंद्र में लाया है, जो लंबे समय तक हाशिए पर रहे। समकालीन हिन्दी उपन्यास साहित्य में उपेक्षित समुदाय जैसे-दलित, स्त्री-विमर्श, किन्नर एवं अन्य वंचित वर्ग के जीवन, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का सशक्त चित्रण हुआ है, जिसने साहित्य की दिशा को परिवर्तित किया।
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References
साहित्यिक निबंध - गणपतिचंद्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1999
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तीसरी ताली - प्रदीप सौरभ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मैं पायल - महेंद्र भीष्म, अमन प्रकाशन, कानपुर