भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी भाषा की विकास यात्रा
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भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हिंदी भाषा का उद्भव वैदिक संस्कृत की वाचिक परंपरा से जुड़ा है, जहाँ वेदों, उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों का मौखिक रूप से संरक्षण हुआ। उस समय ज्ञान को श्रुति परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से यह मौखिक ज्ञान आगे बढ़ता रहा और समाज में ज्ञान का प्रसार होता रहा। समय के साथ संस्कृत से सरल भाषाओं की ओर संक्रमण हुआ। प्राकृत, पाली और अर्द्धमागधी भाषाओं ने ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने में सहायता की। बौद्ध और जैन धर्मों के प्रचार में इन भाषाओं का विशेष योगदान रहा। इनसे अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ, जो हिंदी के प्रारंभिक स्वरूप का आधार बनीं। वाचिक परंपरा में इन भाषाओं ने जनता के बीच भक्ति, ज्ञान और दर्शन को सरलता से पहुँचाया।
हिंदी का लिखित विकास 10वीं से 12वीं शताब्दी के अपभ्रंश साहित्य से हुआ। अमीर खुसरो ने हिन्दवी में रचनाएँ कर हिंदी के लिखित रूप को प्रारंभिक पहचान दी। भक्तिकाल (14वीं-17वीं सदी) में तुलसीदास, सूरदास और कबीर ने अवधी, ब्रज और खड़ी बोली में काव्य रचनाएँ कीं, जिससे हिंदी का व्यापक प्रसार हुआ। रीतिकाल में हिंदी साहित्य में शृंगारिकता प्रमुख रही। आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद ने हिंदी को सामाजिक सुधार, यथार्थवाद और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी ने जनजागरण का कार्य किया। आज हिंदी साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और मीडिया की एक सशक्त भाषा है। इस प्रकार हिंदी भाषा भारतीय अस्मिता और ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर है।
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