समकालीन हिंदी साहित्य: उभरती प्रवृत्तियाँ और नवीन विमर्श
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Abstract
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिंदी साहित्य भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और डिजिटल क्रांति के प्रभावस्वरूप पारंपरिक ढांचों से मुक्त होकर वैश्विक क्षितिज पर विस्तारित हो रहा है। समकालीन लेखन अब आदर्शवाद या मोहभंग तक सीमित न रहकर अस्मिता की खोज और हाशिये के समाज के प्रतिरोध का सशक्त स्वर बन गया है। इसमें दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श के साथ-साथ किन्नर, वृद्ध और पर्यावरण जैसे नवीन विमर्शों की प्रबल उपस्थिति दर्ज की जा रही है। भाषा में संकरता और विधाओं के संलयन ने कथ्य और शिल्प को लोकतांत्रिक बनाया है, जिससे साहित्य सामाजिक हस्तक्षेप का एक प्रामाणिक दस्तावेज सिद्ध हो रहा है।
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