हिंदी उपन्यासों में पर्यावरण चेतना और मानव–प्रकृति संबंध नेहा एन.

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नेहा एन.

Abstract

विज्ञान और तकनीकी के अत्यधिक प्रचलन ने समकालीन मानव जीवन को यांत्रिक बना दिया है, जिससे प्रकृति के साथ उसका नैसर्गिक संबंध क्षीण होता जा रहा है। हिंदी उपन्यासों में मशीनीकरण से उत्पन्न कुंठा, पर्यावरण प्रदूषण और मानव अस्तित्व के संकट को प्रमुखता से उभारा गया है। ‘एक उम्मीद और’, ‘जंगली फूल’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसी कृतियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि मानसिक शांति और अस्तित्व रक्षा के लिए ‘प्रकृति की ओर वापसी’ ही एकमात्र विकल्प है। साहित्य न केवल इन समस्याओं का चित्रण करता है, बल्कि भावी पीढ़ी में पर्यावरण संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवन और प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली के प्रति दायित्व बोध भी जगाता है।

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नेहा एन.

शोधार्थी, राजाजीनगर, बेंगलुरू.

How to Cite

नेहा एन. (2026). हिंदी उपन्यासों में पर्यावरण चेतना और मानव–प्रकृति संबंध नेहा एन. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 12(06), 191 to 198. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/482

References

अभिमन्यु अनत, एक उम्मीद और, पृ. सं. 128

अभिमन्यु अनत, एक उम्मीद और, पृ. सं. 119

जोराम यालाम, जंगली फूल, पृ.सं. 132

विनोद कुमार शुक्ल, दीवार में एक खिड़की रहती थी, पृ.सं. 68