भारतीय भाषाएँ और राष्ट्रीय एकता

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सुनीता रावसाहेब हुन्नरगी

Abstract

भारत विश्व का एक अद्वितीय देश है, जहां विविधता केवल संस्कृति और परंपराओं में ही नहीं, बल्कि भाषाओं में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं, जो भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं। यह भाषाई विविधता भारत की पहचान है और राष्ट्रीय एकता की मजबूत आधारशिला भी है, जो अपनी अलग-अलग पहचान के बावजूद सबको एकता के सूत्र में पिरोती है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 आधिकारिक भाषाएं सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती हैं। हिंदी एक संपर्क भाषा के रूप में और अन्य भारतीय भाषाएं साहित्य-कला के माध्यम से एकता को मजबूत करती हैं, जहां “विविधता में एकता” राष्ट्र की पहचान है। यह बात जरा भी गलत नहीं है, क्योंकि अपने देश की एकता जितनी प्रकट है, उसकी विविधताएं भी उतनी ही प्रत्यक्ष हैं। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषाओं का दर्जा दिया गया है। हिंदी को राजभाषा का स्थान प्राप्त है, लेकिन इसके साथ-साथ अन्य भाषाएं जैसे बंगाली, तमिल, तेलुगू, मराठी, गुजराती, उर्दू, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उड़िया, पंजाबी जैसी भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे अपने-अपने क्षेत्र की आत्मा हैं। जब हम इन भाषाओं का सम्मान करते हैं, तो हम वहां के लोगों की भावनाओं और पहचान का भी सम्मान करते हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में भारत की भाषाएं, संस्कृति तथा राष्ट्रीय एकता का विवेचन किया गया है।

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Author Biography

सुनीता रावसाहेब हुन्नरगी

के.एल.ई. संस्था के जी.आई. बागेवाडी, कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय, निपाणी.

 

How to Cite

सुनीता रावसाहेब हुन्नरगी. (2026). भारतीय भाषाएँ और राष्ट्रीय एकता. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 12(02), 173 to 179. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/358

References

हिंदी का भविष्य - नर्मदेश्वर चतुर्वेदी - पृ. सं. 177

भारतीय संस्कृति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद - पृ. सं. 16

भारतीय संस्कृति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद - पृ. सं. 17

भारतीय संस्कृति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद - पृ. सं. 17

भारतीय संस्कृति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद - पृ. सं. 17

राष्ट्रीय एकता और भाषा की समस्या - भीष्म साहनी - पृ. सं. 8

हिंदी भाषा के विविध रूप - अष्टम अनुसूची