‘सद्गति’: पवित्र शब्द तले दबा उपेक्षित समुदाय
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प्रस्तुत शोध आलेख मुंशी प्रेमचंद की कहानी &सद्गति* के माध्यम से भारतीय ग्रामीण समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और धार्मिक पाखंड की गहन पड़ताल करता है। कहानी के मुख्य पात्र &दुखी चमार* के जीवन और उसकी कारुणिक मृत्यु के इर्द-गिर्द बुना गया यह विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार वर्ण-व्यवस्था और मानसिक दासता मिलकर एक मनुष्य की गरिमा का हनन करती हैं। आलेख में मुख्य रूप से मानसिक दासता, अमानवीय शोषण, दलित संवेदना और मौन विद्रोह जैसे बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है। यह शोध दर्शाता है कि प्रेमचंद ने &सद्गति* शीर्षक के माध्यम से उस विडंबनापूर्ण व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया है, जहाँ धर्म की ओट में मनुष्यता का गला घोंटा जाता है। यह आलेख कहानी की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के अनसुलझे प्रश्नों को मुखर करता है।
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References
प्रेमचन्द, मुंशी। सद्गति। राज्य संसाधन केन्द्र, हरियाणा, डिजिटल संस्करण, पृष्ठ 6
वही पृष्ठ 8
वही पृष्ठ 8-9
वही पृष्ठ 12
वही पृष्ठ 13
वही पृष्ठ 10