नई सदी के उपन्यास में चित्रित सामाजिक यथार्थ
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Abstract
इक्कीसवीं सदी में जीनेवाले भारतीय समाज पर यंत्रयुग हावी हो चुका है। आज समाज के विकास को नापने का परिमाण वैज्ञानिक एवं यांत्रिक प्रगति ही है। यह भी सच है कि इक्कीसवीं सदी में मनुष्य ने अपनी कल्पना का प्रयोग अधिकतर वैज्ञानिक एवं तकनीकी आविष्कारों के लिए किया है। परिणामतः आज के इस यंत्रयुग में मनुष्य भी यंत्र के समान बनता हुआ नजर आ रहा है। तकनीकी युग में हो रही तमाम क्षेत्र की प्रगति का संचालन यंत्र द्वारा ही हो रहा है। आज का मनुष्य अपना अधिक समय यंत्र के सहचर्य में व्यतीत कर रहा है। इसलिए उसकी मानवीय संवेदना खत्म होती जा रही है। आज का मनुष्य यंत्र पर सवार होकर मनुष्य को पीछे छोड़कर गति से दौड़ रहा है। चाँद पर, मंगल पर न जाने अंतरिक्ष में और कई ग्रहों पर जाने की कवायद कर रहा है किंतु उसके पास बैठे हुए आदमी को ही वह भूलता हुआ नजर आ रहा है।
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References
प्रो. प्रमोद चौधरी - उपन्यासकार राजी सेठ - पृ. सं. 34
मैत्रेयी पुष्पा - अगनपायी - पृ. सं. 73
शरद सिंह - कस्बाई सिमोन - पृ. सं. 31
सिम्मी हर्षिता - रंगशाला - पृ. सं. 86
शरद सिंह - पचकौड़ी - पृ. सं. 73