अनामिका की कविताओं में उपेक्षित स्त्री
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Abstract
साहित्य समाज का दर्पण है। यह न केवल समाज की मुख्यधारा को अभिव्यक्त करता है, बल्कि उन वर्गों की आवाज़ भी बनता है जिन्हें सदियों से अनदेखा या उपेक्षित किया जा रहा है। &उपेक्षित समाज* से आशय उन समुदायों से है जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हैं। जैसे दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, किन्नर, श्रमिक वर्ग या स्त्री और अन्य हाशिए पर स्थित समूह। हिन्दी साहित्य ने ऐसे उपेक्षित समाज या वर्गों के जीवन संघर्ष, वेदना, संस्कृति, अस्मिता आदि को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस आलेख में अनामिका के द्वारा लिखित हिन्दी कविताओं में उपेक्षित स्त्री पर दृष्टिपात करने का प्रयास किया गया है।
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References
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डॉ. प्रभा खेतान, हिन्दी रूपांतरण- स्त्री उपेक्षिता, हिन्दी पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, जे-40, जोरबाग लेन, नई दिल्ली, संस्करण- 2002, पृ. सं -19
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वही, पृ. सं -83
वही, पृ. सं -61
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