हिन्दी साहित्य की अंतरात्मा: उपेक्षित समुदायों का सांस्कृतिक एवं सामाजिक यथार्थ

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डॉ. सुनील गुलाबसिंग जाधव

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प्रस्तुत आलेख हिन्दी साहित्य के फलक पर उन समुदायों की उपस्थिति और उनके संघर्षों का विश्लेषण करता है, जिन्हें सदियों तक मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रखा गया। साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ भी है। इस आलेख के माध्यम से दलित, आदिवासी, विमुक्त और घुमंतू समुदायों के सांस्कृतिक वैभव और उनके सामाजिक शोषण के यथार्थ को टटोलने की कोशिश की गई है। शोध का मुख्य केंद्र यह है कि कैसे बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में इन समुदायों ने अपनी पीड़ा को स्वयं की भाषा और संवेदना में व्यक्त करना शुरू किया। सहानुभूति से स्वानुभूति तक की यह यात्रा हिन्दी साहित्य में एक युगांतकारी परिवर्तन है। आलेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि उपेक्षित समुदायों का साहित्य केवल विरोध का साहित्य नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा और समानता की पुनर्स्थापना का एक जीवंत दस्तावेज़ है।

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डॉ. सुनील गुलाबसिंग जाधव

हिन्दी विभाग, यशवंत महाविद्यालय, नांदेड़.

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सुनील गुलाबसिंग जाधव. (2026). हिन्दी साहित्य की अंतरात्मा: उपेक्षित समुदायों का सांस्कृतिक एवं सामाजिक यथार्थ. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 15(03), 124 to 128. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/2045

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