हिंदी कहानी में स्त्री विमर्श
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समकालीन हिंदी कहानियों में स्त्री-विमर्श केवल देह मुक्ति तक सीमित न होकर, पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व, अस्मिता और मानवीय अधिकारों की खोज का सशक्त माध्यम बन गया है। उषा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, मंजुल भगत, मालती जोशी और ममता कालिया जैसी प्रमुख लेखिकाओं की कहानियों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि आज की नारी शोषण, पारिवारिक दबाव और वैवाहिक विडंबनाओं को चुनौती देते हुए अपने स्वत्व और समानता के लिए संघर्षरत है। ये कहानियां स्त्री के बदलते स्वरूप, मानसिक द्वंद्व, पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं और आत्मनिर्भरता की आकांक्षा को अत्यंत मार्मिकता और यथार्थ के साथ रेखांकित करती हैं।
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References
हिन्दी कहानी आठवां दशक : मधुर उप्रेती
गुलमोहर के गुच्छे : मंजुल भगत
मन्नू भंडारी की श्रेष्ठ कहानियां
स्वयंवर, सती : मालती जोशी