हिन्दी ज्ञान परंपरा और साहित्येतिहास लेखन

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वेदमूर्ती सी आर

Abstract

ज्ञान परंपराएँ धर्म के वैशिष्ट्य से परिपूर्ण होकर इस विश्व को निरंतर परिपूर्णता का चमक देती है। उसका प्रभाव विश्व को प्रत्येक क्षेत्र में बाँटा है। हिन्दी ज्ञान परंपरा, साहित्य जगत का सूर्य है, जो विभिन्न रूपी किरणों से चमकते हुए सम्पूर्ण संसार को आलोकित करता है। ज्ञान परंपरा को प्रभावित करनेवाले इस हिन्दी सूर्य की ओर यदि दृष्टिपात किया जाए तो गद्य, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, एकाँकी, नाटक, और यात्रा साहित्य आदि रश्मियों के रूप में यह संसार की विभिन्न यथार्थ भावनाओं को समाज के समक्ष प्रकाशित करने में अग्रणी है। यह जनसामान्य को नवीन चेतना, जागरूकता, सजगता की ओर ले जाता है। इस विषय के किसी भी पक्ष पर दृष्टिपात करने से पूर्व ही यदि परंपरा शब्द की व्याख्या की जाये, तो परंपरा वह संपत्ति है जो बिना रुके निरंतर गति से अपने कर्म पथ की ओर अग्रसारित होती रहती है। यह परंपरा अपने अंदर समेटे हुए ज्ञान को चारों ओर आलोकित करते, व्याप्त दुख, वेदना को अपने अंदर समाहित करते हुए कल्पना और भाव से उसमें ऊर्जा भर उसे जनमानस तक पहुँचाती है और इस प्रकार सुखी मानव के हृदय में एक ऐसी जागृति प्रदान करती है जिससे दूर-दूर तक व्यक्ति एक दूसरे के साथ जुड़कर सद्भावनाओं को अंगीकार करता है। यह परंपरा ज्ञानस्वरूप है, चेतना स्वरूप है, संस्कृति स्वरूप है, नैतिक गुण स्वरूप है। इसलिए यह परंपरा नित्य नवीन है और नई विचार से युक्त है। जो जीवन को नवीन आलोक देनेवाली होती है, नये मूल्यों से जोड़नेवाली होती है, नये ज्ञान का प्रतीक होती है। भारतीय सभ्यता ने ज्ञान को बहुत महत्व दिया है, जैसा कि इसके आश्चर्यजनक रूप से विशाल बौद्धिक ग्रंथों, दुनिया से पांडुलिपियों के सबसे बड़े संग्रह और विभिन्न प्रकार के ग्रंथों, विचारकों और विद्यालयों की अच्छी तरह से प्रलेखित विरासत से पता चलता है। भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता (४,३३-३८) में अर्जुन को मार्गदर्शन दिया कि ज्ञान आत्म शुद्धि और मुक्ति का सबसे बड़ा साधन है। भारत में ज्ञान का एक लंबा इतिहास है जो गंगा नदी की तरह निरंतर जारी है। वेदों, उपनिषदों से लेकर श्री अरबिंदो तक, ज्ञान सभी शोधों का केंद्र बिंदु रहा है। भारतीय ज्ञान प्रणालियों की भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिकता में एक मजबूत नींव है और यह हजारों वर्षों से विकसित हुई है।

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वेदमूर्ती सी आर

प्राध्यापक और मुख्यस्थ, हिन्दी विभाग, नॅशनल कॉलेजु, बसवनगुड़ी, बेंगलुरू.

References

महोपनिषद्, अध्याय 4, श्‍लोक 71

When Einstein Met Tagore: How the Scientist Engaged With India

संपादन श्यामसुन्दरदास, कबीर ग्रंथावली, इंडियन प्रेस प्रयाग प्रकाशन नागरीप्रचारिणी ग्रन्थमाला-33

वही ग्रन्थमाला-33

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हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, राजकमल प्रकाशन 2013

संपादन श्यामसुन्दरदास, कबीर ग्रंथावली, इंडियन प्रेस प्रयाग प्रकाशन नागरीप्रचारिणी ग्रन्थमाला-33

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बालमीक नारद घटजोनी - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर