ज्ञान परंपरा और प्राचीन हिंदी साहित्य (सिद्ध, नाथ, जैन, रासो)

Main Article Content

मालती ए. एम.

Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी प्राचीन साहित्य के बीच गहरा संबंध है। हिंदी साहित्य, भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त करता है, जैसे कि वेदों, उपनिषदों और अन्य प्राचीन ग्रंथों से प्रेरित होकर हिंदी साहित्य ने इन ज्ञान परंपराओं को संरक्षित, प्रचारित और विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्य में सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य प्रमुख धार्मिक साहित्य के रूप में शामिल हैं। ये तीनों साहित्य अपने-अपने धर्मों के प्रचार-प्रसार और आध्यात्मिक अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए लिखे गए थे। सिद्ध साहित्य में सरहप्पा, शबरप्पा जैसे सिद्धों द्वारा रचित रचनाएँ हैं, जो बौद्ध धर्म के तांत्रिक मार्ग से प्रभावित हैं। नाथ साहित्य में भगवान शिव के उपासक नाथों द्वारा रचित रचनाएँ हैं, जो गुरु महिमा, योग और हठयोग पर बल देती हैं। हिंदी साहित्य परंपरा का मुख्य उद्देश्य आत्मा को ऊँचा उठाना, मनुष्य के गुणों को परिष्कृत करना, और उसे आनंद की अवस्था में पहुँचाना है। साहित्य अतीत से जीवन मूल्यों को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने में सेतु का काम करता है। यह मनुष्य को उसके कर्तव्यों और दायित्वों से परिचित कराता है और उसे समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूक करता है। हिंदी साहित्य परंपरा का परिचय हिंदी भाषा के साहित्यिक इतिहास को दर्शाता है, जो संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओं से विकसित हुआ है। यह साहित्य विभिन्न साहित्यिक विधाओं जैसे गद्य, पद्य और चम्पू में रचा गया है और इसमें भक्ति, प्रेम, ज्ञान, और श्रृंगार जैसे विषयों को दर्शाया गया है। हिंदी साहित्य को आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल जैसे विभिन्न कालों में विभाजित किया गया है।

Article Details

Section

Research Articles

Author Biography

मालती ए. एम.

हिन्दी विभागाध्यक्ष, आर.एन.एस.एफ.जी.सी., बेंगलूर.

How to Cite

मालती ए. एम. (2025). ज्ञान परंपरा और प्राचीन हिंदी साहित्य (सिद्ध, नाथ, जैन, रासो). ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 7(03), 254 to 257. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1210

References

हिंदी साहित्य में सामासिक संस्कृति के तत्त्व -डॉ. शिवनंदन प्रसाद - भारतकोश, ज्ञान का हिंदी महासागर

डॉ. रामछबीला त्रिपाठी, भारतीय साहित्य, पृष्ठ सं. 65

डॉ. अरुणा रानी, जैन धर्म की स्थायी विरासत : भारतीय संस्कृति और विचार पर इसका प्रभाव, पृष्ठ सं. 204