भारतीय ज्ञान परम्परा इस देश के मिजाज में है

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दीपक कुमार गोंड

Abstract

अति-आधुनिक, मिश्रित (भारतीय-पाश्चात्य) ज्ञान प्रणाली व सभ्यता के व्यापक विकास के साथ हम इतनी दूर चले आए कि आज जब भी हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो लगता है कि जैसे भारतीय ज्ञान परम्परा या प्रणाली जैसी अवधारणा हमारे समाज में कभी थी ही नहीं और अगर थी भी तो उसे हम अपनी अज्ञानता, संकुचित परम्परा एवं असभ्यता का प्रतीक मान कर मुँह फेर लेते हैं। जबकि वही हमारे ज्ञान, गौरव और सभ्यता की निशानी थी। जिसे आज भी कुछ जातियाँ व सम्प्रदाय अपनी साँस्कृतिक धरोहर के रूप में, अपने पुरखों के सम्मान के रूप में सुरक्षित रखे हुए हैं। भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझना अपनी भारतीयता के सम्मान के प्रति सच्ची निष्ठा एवं प्रेम को समझना है। अगर हम भारतीय होने पर जरा भी सचेत नहीं हैं तो इस विषय पर आगे बात करना या पढ़ना बिलकुल व्यर्थ परिश्रम सा प्रतीत होगा। अतः यह जरुरी है कि हम इस विषय पर विचार करने से पूर्व अपने हृदय में अपने देश या संस्कृति के प्रति एक सकारात्मक व अन्वेषण दृष्टिकोण से अपने भारतीय ज्ञान की विरासत का अवलोकनार्थ अध्ययन करते रहना होगा।
हम जानते हैं कि विश्व में ज्ञान प्रणाली के विविध रूप हैं। ज्ञान प्रणाली के द्वारा मनुष्य भौतिक तथा बौद्धिक सामाजिक क्रियाकलाप करके अनुभव जगत के द्वारा वस्तुनिष्ठ गुणों और संबंधों, प्राकृतिक और मानवीय तत्त्वों के बारे में अभिव्यक्ति करता है। ज्ञान दैनंदिन तथा वैज्ञानिक हो सकता है तथा समाज में ज्ञान की मिथकीय, कलात्मक, धार्मिक तथा अन्य कई अनुभूतियाँ भी होती हैं। सैद्धांतिक रूप में सामाजिक-ऐतिहासिक स्थितियों में मनुष्य के क्रियाकलाप की निर्भरता को प्रकट किए बिना ज्ञान के महत्त्व को नहीं समझा जा सकता है। साधारण शब्दों में कहें तो ‘अनुभव की अनुभूति ही ज्ञान कहलाता है।’ लेकिन अनुभूति मात्र से ही ज्ञान का विकास संभव नहीं होगा, क्योंकि ज्ञान परम्परा मानव समाज में प्राचीन काल से चली आ रही परम्परा है। ज्ञान के उद्भव से लेकर मानव सभ्यता के विकास तक इस परम्परा ने अपनी निरन्तरता को बनाए रखा है। मानव सभ्यता जैसे-जैसे विकास करती गई, वैसे-वैसे यह परम्परा वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी विकसित होती गई। लेकिन आज के दौर में या हमारी आधुनिक ज्ञान प्रणाली के विकास में भारतीय ज्ञान प्रणाली की अलग से चर्चा कराने की आवश्यकता क्यों महसूस की जाने लगी है? क्या इस प्रणाली से हम कोई नई परम्परा विकसित करना चाहते हैं या इस प्रणाली के बहाने इतिहास का शव परीक्षण करना चाहते हैं। यह हमें तय करना होगा। क्योंकि भारतीय ज्ञान प्रणाली न तो कोई नई ज्ञान प्रणाली है और न ही इसके द्वारा किसी गड़े मुर्दे को उखाड़ने की बात हो रही है बल्कि हम मानव सभ्यता के विकास में इस ज्ञान परम्परा के कई अंतर्विरोधों को स्पष्ट करते हुए अपनी भारतीयता की अवधारणा को वैश्विक पटल पर अवस्थित करना चाहते हैं।
यहाँ हम एक ऐसी परम्परा को भी देख सकते हैं जो ज्ञान की परम्परा के साथ-साथ विकास की है और वह परम्परा मनुष्य-मनुष्य के बीच सम्प्रेषण के रूप में इस्तेमाल होने वाली वाचिक परम्परा की भाषा है। वाचिक परम्परा भारतीय ज्ञान परम्परा के मिजाज में है, जिसका विकास साथ-साथ चला है और जिसकी चर्चा यहाँ करना भी अनिवार्य होगा। हम वाचिक परम्परा के सहारे भारतीय ज्ञान परम्परा को स्पष्ट एवं गहरे स्तर पर समझ सकते हैं।

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Author Biography

दीपक कुमार गोंड

सहायक आचार्य, क्राइस्ट एकेडमी, इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज, बेंगलूरु.

References

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कवि सम्मेलन ब्लाग, https://chakradhar.in/kavi-sammelan/ एक होता है शब्द, एक होती है परम्परा, लेखक अशोक चक्रधर, 1 जुलाई 2018, समय 2:30 pm