पर्यावरण साहित्य और हरित चिंतन
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Abstract
समकालीन युग में पर्यावरण-संकट मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है, इसलिए हिंदी साहित्य में पर्यावरण और हरित चिंतन का विमर्श अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। हिंदी के कवियों, कथाकारों और निबंधकारों ने प्रकृति का केवल सौंदर्य-वर्णन ही नहीं किया, बल्कि प्रदूषण, वनों की कटाई, जल-संकट, औद्योगीकरण और उपभोक्तावाद से उत्पन्न संकटों को भी रचनात्मक ढंग से सामने रखा है। इस शोध-पत्र में पर्यावरण साहित्य की अवधारणा, हरित चिंतन का वैचारिक आधार, तथा हिंदी गद्य-पद्य रचनाकारों की पर्यावरणीय दृष्टि का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास, महादेवी वर्मा, केदारनाथ सिंह, अनुपम मिश्र, निर्मला पुतुल, हरिराम मीणा आदि रचनाकारों की रचनाओं के उदाहरण लेकर यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि साहित्य किस प्रकार समाज में पर्यावरणीय चेतना और संरक्षण का भाव पैदा करता है। अंत में निष्कर्ष के रूप में यह प्रतिपादित किया गया है कि हरित चिंतन केवल साहित्यिक रुझान नहीं, बल्कि मानव–केन्द्रित विकास मॉडल के स्थान पर प्रकृति–केन्द्रित संतुलित विकास की ओर उन्मुख एक वैचारिक आंदोलन है।
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