सुरेंद्र शर्मा कृत ‘मुझसे भला न कोय’ निबंध संग्रह में व्यंग्य
Main Article Content
Abstract
सुरेंद्र शर्मा का निबंध-संग्रह ‘मुझसे भला न कोय’ हिंदी व्यंग्य साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखता है। इस संग्रह में लेखक ने हँसी और व्यंग्य के माध्यम से समाज के भीतर व्याप्त स्वार्थ, नैतिक पतन, और राजनीतिक दिखावे पर तीखी टिप्पणी की है। उनका व्यंग्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक सुधार की दिशा में एक सार्थक पहल है। यह आलेख सुरेंद्र शर्मा की व्यंग्य-दृष्टि, उनकी भाषा-शैली और सामाजिक यथार्थ से उनके जुड़ाव का विश्लेषण करता है। ‘मुझसे भला न कोय’ के निबंध संग्रह में वे आधुनिक भारतीय समाज की जटिलताओं का सजीव चित्रण करते हैं। इनमें लेखक ने व्यक्ति और व्यवस्था दोनों पर व्यंग्य किया है। विषय चाहे राजनीति हो, शिक्षा, धर्म, या आम जीवन की छोटी-बड़ी घटनाएँ - हर प्रसंग में लेखक ने विसंगतियों को अत्यंत सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। इस संग्रह के निबंधों में लेखक स्वयं को भी व्यंग्य का पात्र बनाते हैं। वह दूसरों पर हँसने के साथ स्वयं पर भी हँसते हैं, जिससे उनकी दृष्टि अधिक ईमानदार और आत्मविश्लेषणात्मक बन जाती है। निबंध का शीर्षक ‘मुझसे भला न कोय’ स्वयं में ही व्यंग्यात्मक है - यह आधुनिक मनुष्य के अहंकार, आत्ममुग्धता और आत्म-प्रशंसा की प्रवृत्ति पर प्रकाश डालता है।
Article Details
Section

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
References
सुरेंद्र शर्मा, ‘मुझसे भला न कोय’, अव्यक्त प्रकाशन, 2020