आधुनिक हिंदी नाटकों की रंगचेतना और रंगमंच

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मनोज कांबले

Abstract

हिंदी नाटकों और रंगमंच का संबंध पुरातन काल से ही अत्यंत घनिष्ठ रहा है, जो संस्कृत और लोक नाट्य परंपराओं से विकसित होकर आधुनिक काल तक पहुँचा है। पारसी रंगमंच के व्यावसायिक दौर के बाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद ने हिंदी रंगमंच को साहित्यिक और कलात्मक आधार प्रदान किया। स्वतंत्रता के पश्चात, विशेषकर 1950 के बाद, हिंदी नाटकों में युगান্তकारी परिवर्तन आए। मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और सुरेंद्र वर्मा जैसे नाटककारों ने पाश्चात्य नाट्य शैलियों (जैसे इब्सन और एब्सर्ड थियेटर) और भारतीय परंपराओं का समन्वय करते हुए ‘आधे-अधूरे’ और ‘अंधा युग’ जैसी कालजयी रचनाएँ दीं। आधुनिक रंगचेतना में नाटक केवल पाठ्य वस्तु न रहकर, रंगमंच की तकनीकी आवश्यकताओं, प्रकाश व्यवस्था और अभिनय के अनुरूप सृजित किए जाने लगे हैं, जिससे नाटककार और रंगकर्मी के बीच का संबंध और अधिक गहरा हुआ है।

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मनोज कांबले

सहायक प्रोफेसर, लाल बहादुर शास्त्री शिक्षा महाविद्यालय, बेंगलुरू।

References

डॉ. सावित्री स्वरूप - नव्य हिन्दी नाटक, पृष्ठ संख्या 296

जयशंकर प्रसाद - काल और कला संबंध, पृष्ठ 10 प्रथम संस्करण

देवेन्द्रराज अंकुर - पढ़ते सुनते देखते, पृष्ठ संख्या – 150

महेश आनन्द, देवेन्द्रराज अंकुर - रंगमंच के सिद्धान्त, पृष्ठ संख्या - 290

डॉ. लक्ष्मी नारायणलाल - आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच, पृष्ठ संख्या – 41

डॉ. सुषमा बेदी - हिन्दी नाट्य प्रयोग के सन्दर्भ में, पृष्ठ संख्या - 31

डॉ. सत्यवती त्रिपाठी - आधुनिक हिंदी नाटकों की प्रयोगधर्मिता, पृष्ठ संख्या -33

जयदेव तनेजा - नयी रंग चेतना और हिंदी नाटककार, पृष्ठ संख्या - 12