डॉ. महेश दिवाकर जी की कविता में “माँ की पीड़ा” का विमर्श

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एफ. बी. नायकर

Abstract

डॉ. महेश दिवाकर रचित ‘माँ की पीड़ा’ कविता मातृत्व के असीम त्याग, समर्पण और वात्सल्य का सजीव चित्रण करती है। गर्भावस्था के नौ महीनों में माँ द्वारा सहे गए असहनीय शारीरिक और मानसिक कष्टों को इसमें अत्यंत मार्मिक रूप से दर्शाया गया है। ईश्वरीय आस्था और मनोबल के सहारे माँ प्रसव की दारुण पीड़ा सहन करती है। संतान के जन्म लेते ही वह अपने सारे दुख भूलकर उसे मंगलमय जीवन का आशीर्वाद देती है। मातृत्व की महिमा और निस्वार्थ प्रेम को गहराई से रेखांकित करते हुए, यह विश्लेषण माँ को ईश्वर के तुल्य स्थापित करता है, जिसका सर्वोच्च लक्ष्य केवल अपनी संतान का कल्याण है।

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एफ. बी. नायकर

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, सरकारी प्रथम दर्जा महाविद्यालय, सवणूर, हावेरी.

How to Cite

एफ. बी. नायकर. (2026). डॉ. महेश दिवाकर जी की कविता में “माँ की पीड़ा” का विमर्श. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 16(06), 198 to 201. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/2245

References

दिवाकर, डॉ. म. (२०२४). लोकधार -११. विश्व पुस्तक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. ४५०-४५३.