कबीरदास के साहित्य में अभिव्यक्त दार्शनिक विचारों की प्रासंगिकता
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Abstract
यह आलेख संत कबीरदास के साहित्य और दर्शन की सार्वकालिक महत्व का विश्लेषण करता है। पंद्रहवीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के निर्गुण पंथ के प्रमुख स्तंभ कबीर ने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक पाखंड और जातीय भेदभाव पर अपनी ‘आँखिन की देखी’ अर्थात् अनुभवजन्य सत्य के आधार पर प्रहार किया। यह आलेख स्थापित करता है कि कबीर का दर्शन मनुष्य की आंतरिक स्वाधीनता, सामाजिक समता और कर्म-आधारित श्रेष्ठता पर बल देता है। उनका सहज मार्ग किसी बाहरी आडंबर के बजाय हृदय की शुद्धता को महत्व देता है, जो आज के विभाजित समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। कबीर केवल एक मध्ययुगीन कवि नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक विचारक हैं, जिनकी शिक्षाएं आज भी अन्याय और अज्ञान के विरुद्ध एक सशक्त मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती हैं।
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अमृत संदेश कबीर वाणी, भक्त कवि कबीरदास, रजत प्रकाशन
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