आधुनिक हिंदी साहित्य और समाज
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Abstract
साहित्य में प्रचलित प्रत्येक अवधारणा का अपने समाज के साथ गहरा संबंध होता है। हिंदी साहित्य के विशेष संदर्भ में बात की जाए तो आधुनिक काल से लेकर भक्तिकाल, रीत काल, छायावादी युग, प्रगतिवादी युग एवं प्रयोगवादी युग आदि धाराओं का अपना एक सामाजिक महत्त्व कहा जाता है। अर्थात यदि देखा जाए तो साहित्य को समाज की प्रतिकृति या प्रतिरूप माना जाना चाहिए। परन्तु आधुनिक साहित्य और समाज के संबंध की बात जब हम लोग करते हैं तो हमारे सामने एक बात मुख्य रूप से उपस्थित होती है कि हम साहित्यकार से जिस सामाजिक यथार्थ के प्रस्तुत करने की आशा से आधुनिक साहित्य की कल्पना करते हैं।
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हिंदी साहित्य एक आधुनिक परिदृश्य: सचिदानंद वात्स्यायन
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समाजशास्त्र नामक ग्रंथ: डॉ. नागेंद्र