वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास
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Abstract
यह शोध-पत्र 21वीं शताब्दी के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन, वैश्वीकरण (भूमंडलीकरण) के हिंदी भाषा और साहित्य पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण करता है। 1991 के बाद लागू हुए वैश्वीकरण ने भारतीय समाज में तकनीकी उन्नति, नव-मध्यम वर्ग का विकास और रोजगार के अवसर बढ़ाए, किंतु इसने पूंजीवादी मानसिकता और सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण जैसी नकारात्मकताएँ भी पैदा कीं। इस दौर में हिंदी को वैश्विक मंच मिला, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता से इसके आर्थिक विकास में बाधा आई। हिंदी साहित्य के लिए, वैश्वीकरण ने प्रवासी जीवन, उपभोक्तावाद और पर्यावरण संकट जैसे नए विषय दिए, जिससे साहित्य का दायरा विस्तृत हुआ और उसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली। निष्कर्षतः, हिंदी साहित्य के सामने आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ अपनी मौलिक सांस्कृतिक अस्मिता को बनाए रखने की चुनौती है।
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How to Cite
References
हिन्दी भाषा एवं साहित्य : विविध आयाम (पृ. संख्या 35) लेखक - डॉ. येल्लुरे एम. ए.
हिन्दी भाषा एवं साहित्य : विविध आयाम (पृ. संख्या 126) लेखक - डॉ. येल्लुरे एम. ए.
हिंदी का वैश्विक परिदृश्य
अंतर्जाल
यूट्यूब चैनल (एकलव्य स्नातक) “बीए 4th Sem पॉलिटिकल साइंस” चैप्टर