गीताश्री की कहानियों में चित्रित सामाजिकसरोकार

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पूनम प्रवीण पाटील

Abstract

यह शोध-पत्र आधुनिक कथाकार एवं वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री की कहानियों में चित्रित सामाजिक सरोकारों का विश्लेषण करता है। उनके साहित्य में नारी जीवन के संघर्ष और विसंगतियाँ मुख्य रूप से परिलक्षित होती हैं। 21वीं सदी के बदलते परिवेश में, गीताश्री ने टूटते दांपत्य संबंध, युवा पीढ़ी के स्वतंत्र निर्णय और वृद्धों के एकाकी जीवन जैसे संवेदनशील सामाजिक आयामों को अपनी कहानियों में यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। ‘सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी’ और ‘बाबूजी का बक्सा’ जैसे दृष्टांतों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि उनकी कहानियाँ आधुनिक परिवार और समाज की जटिलताओं तथा बदलते मानवीय मूल्यों का गहरा चित्रण करती हैं, जो पाठकों को चिंतन के लिए प्रेरित करता है।

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Research Articles

Author Biography

पूनम प्रवीण पाटील

शोध छात्रा, शिवाजी विश्वविद्यालय,कोल्हापुर।.

How to Cite

पूनम प्रवीण पाटील. (2025). गीताश्री की कहानियों में चित्रित सामाजिकसरोकार. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 8(05), 150 to 155. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1515

References

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गीताश्री,सैंया निकस गए,मैं ना लड़ी थी,मत्स्यगंधा,प्रथम संस्करण 2022,शिवना प्रकाशन, मध्यप्रदेश,पृष्ठ 8

गीताश्री, सैंया निकस गए,मैं ना लड़ी थी,मत्स्यगंधा, प्रथम संस्करण 2022, शिवना प्रकाशन, मध्यप्रदेश, पृष्ठ 8

गीताश्री,बाबूजी का बक्सा,मन बसंत तन जेठ, प्रथम संस्करण 2021,वनिका प्रकाशन,पृष्ठ 120

गीताश्री, बाबूजी का बक्सा,मन बसंत तन जेठ,प्रथम संस्करण 2021, वनिका प्रकाशन,पृष्ठ 120

गीताश्री,ताप,प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ, प्रथम संस्करण 2013,वाणी प्रकाशन,पृष्ठ 85

गीताश्री,ताप, प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ,प्रथम संस्करण 2013,वाणी प्रकाशन,पृष्ठ85

गीताश्री,उनकी महफिल से हम उठतो आए,बलम कलकत्ता,दूसरा संस्करण 2021, प्रलेक प्रकाशन मुंबई,पृष्ठ 39

गीताश्री, उनकी मह‌फिल से हम उठ तो आए, बलम कलकत्ता,दुसरा संस्करण 2021, प्रलेक प्रकाशन मुबई,पृष्ठ 39