साहित्य सरिता से सजग समाज

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मलगौडा पाटील

Abstract

साहित्य और समाज के बीच में भावनात्मक संबंध है, जो मानव मन की उपज है। मानव सभ्यता का विकास नदी के दोनों तट पर दिखाई देता है, तो मानव निर्मित साहित्य का उद्गम समाज के बीच जीवन जीते हुए, जब मानव अनेक अनुभवों को प्राप्त करता है, तब होता है। मानव अपने इन अनुभवों के भावनाओं में बहने से जन्में विचारों को लिखता है, उसी को हम साहित्य कहते हैं। यही साहित्य मानव निर्मित समाज में एक क्रांति ला सकता है। साहित्य हमेशा से समाज में सदाचार को बचाए रखने का प्रयास करता हुआ आ रहा है और इस कार्य में अनेक बार सफलता को प्राप्त कर चुका है। लेकिन इस 21वीं शताब्दी में हम पाते हैं कि मानव के मन में उठने वाले दुराचार भाव इन सदाचार भावों पर हावी हो रहे हैं। इसके लिए कारण यह हो सकता है कि 21वीं शताब्दी के इंसान का साहित्य के प्रति नीरस मनोभाव। इंसान के पढ़ने की अरुचि के कारण उसके भावनात्मक स्रोत के साथ-साथ साहित्य रूपी सरिता भी प्रभावित होती जा रही है। जिस तरह से समाज में अनेक भावनाएँ प्रवाहित होती हैं, जैसे सामाजिकता, सदाचार, सद्भावना और सदुद्देश्य। इन भावनाओं को अगर बचाकर रखना चाहिए, तो साहित्य सरिता निरंतर प्रवाहित होती रहनी चाहिए। साहित्य से समरसता और क्रांति के बीज प्रस्फुटित होते हैं, जिससे सामाजिक उन्नति के साथ-साथ समाज के अंदर निहित बुराइयों को मिटाने के भाव भी होते हैं। इस लेख से हमें यह पता चलता है कि व्यक्ति के बिना समाज की कल्पना नहीं और व्यक्ति की कल्पनाओं के बिना साहित्य का सृजन नहीं, तो यहाँ पर व्यक्ति ही केंद्र है। तो इससे हमें यह ज्ञात होता है कि समाज और साहित्य का संबंध अटूट है। जब तक व्यक्ति है, तब तक समाज है और साहित्य भी। इस संबंध का आदि तो हो चुका है, लेकिन इसका अंत मानव के मन में उठने वाली भावनाएँ जब थम जाएँगी, तब इनका संबंध भी शीतल होता जाएगा।

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Author Biography

मलगौडा पाटील

हिंदी विभाग, के. एल. ई. बी. के. कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय, चिक्कोडि।

 

How to Cite

मलगौडा पाटील. (2025). साहित्य सरिता से सजग समाज. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 8(05), 115 to121. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1509

References

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