वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास

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महादेवी कणवी

Abstract

प्रस्तुत शोध-पत्र वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण हिंदी भाषा और साहित्य के विश्वव्यापी विकास का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ते आकर्षण के चलते हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 200 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है। लेख प्रमुख रूप से आर्थिक कारकों पर बल देता है, जहाँ उदारीकरण ने हिंदी को भारतीय बाजार की एक अनिवार्य वाणिज्यिक भाषा बना दिया है। मीडिया, सिनेमा और विदेशी विज्ञापनों में हिंदी की प्रमुखता इस बात की पुष्टि करती है। इसके अतिरिक्त, प्रवासी भारतीयों की बड़ी आबादी हिंदी को सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण का माध्यम मानती है। यह अध्ययन मॉरीशस, जापान, अमेरिका और पड़ोसी देशों सहित विश्व भर में हिंदी शिक्षण की मौजूदा व्यवस्थाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जो हिंदी के एक महत्वपूर्ण विश्व भाषा के रूप में स्थापित होने की पुष्टि करता है।

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Research Articles

Author Biography

महादेवी कणवी

हिंदी विभागध्यक्ष, के.एल.ई संस्था का जी.एच. महाविद्यालय, हावेरी, कर्नाटक.

 

How to Cite

महादेवी कणवी. (2025). वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 8(05), 107 to 114. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1508

References

आकर संक्रमण काल में संजना 25वाँ रजत जयंती अंक

बहुवचन 38 जुलाई-सितंबर 2013

गवेषणा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा अंक 105

हिंदी और उसका अखिल भारतीय प्रयोग बृजेश्वर वर्मा

वाणिज्य और व्यापार की भाषा के रूप में हिंदी कृष्ण कुमार गोस्वामी

सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल. सुनीता बाय

पूर्वोत्तर का भाषाई परिदृश्य और हिंदी की स्थिति वीरेंद्र परमार

अंडमान तथा निकोबार में हिंदी व्यासदेव त्रिपाठी

भारत के पड़ोसी देशों में हिंदी अरुण चतुर्वेदी

जापान में हिंदी एक आकलन हरेंद्र चौधरी

विदेश में हिंदी की संभावनाएं और भविष्य डॉ. मोतीलाल गुप्त ‘आदित्य’ नया संचार samachar.com