वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास

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एम.डी. गुरव

Abstract

यह शोधपत्र वैश्वीकरण के युग में हिंदी साहित्य, विशेषकर उपन्यास साहित्य के विकास, भाषा और संस्कृति पर इसके प्रभाव का विश्लेषण करता है। यह महानगरीय जीवन में बढ़ी हुई असुरक्षा, अस्थिर जीवनशैली, मानवीय संवेदनशीलता के ह्रास और युवा वर्ग की समस्याओं को ममता कालिया, मालती जोशी, और कृष्णा सोबती के उपन्यासों के माध्यम से दर्शाता है। वैश्वीकरण ने भले ही तकनीकी उन्नति लाई हो, पर इसने उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिससे नाते-रिश्ते और मानवीय मूल्य कमज़ोर हुए हैं। यह शोध हिंदी भाषा की बढ़ती वैश्विक पहचान और साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर भी बल देता है।

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एम.डी. गुरव

हिंदी विभाग, के.एल.ई. जी. आई. बागवाड़ी कॉलेज, निपाणी।

How to Cite

एम.डी. गुरव. (2025). वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 8(05), 30 to 37. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1496

References

भारतीय मध्य वर्ग और सामाजिक उपन्यास डा. थॉमस पृष्ठ 21

मेरे सपनों का भारत महात्मा गांधी पृष्ठ 38

त्यागपत्र जैनेन्द्र कुमार उपन्यास पृष्ठ 53

दौड़ ममता कालिया उपन्यास पृष्ठ 08

दौड़ ममता कालिया उपन्यास पृष्ठ 10

दौड़ ममता कालिया उपन्यास पृष्ठ 10

सहचारिणी मालती जोशी पृष्ठ 62

हिंदी साहित्य का इतिहास