प्रेमचंद के साहित्य में जनभाषा की सांस्कृतिक पहचान

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डी.एम. मुल्ला

Abstract

प्रस्तुत शोध-पत्र हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कथाकार प्रेमचंद के साहित्य में प्रयुक्त जनभाषा की सांस्कृतिक पहचान का गहन विश्लेषण करता है। प्रेमचंद ने साहित्य को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर, उसे यथार्थ और आदर्शवाद की धरती से जोड़ा। उनकी भाषा, जो हिंदी और उर्दू का सहज, सरल मिश्रण है और जिसे हिंदुस्तानी भी कहा जाता है, ने उन्हें सीधे आम जनता से जोड़ा। महात्मा गांधी के जनभाषा संबंधी विचारों से प्रेरित होकर, उन्होंने अपनी कृतियों में ग्रामीण मुहावरों, लोकोक्तियों और जनसाधारण की बोलचाल का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया। ‘गोदान’, ‘प्रेमाश्रम’ और ‘रंगभूमि’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से, लेखक ने यह दर्शाया कि कैसे पात्रों की भाषा उनकी सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्थिति के यथार्थ को दर्शाती है। निष्कर्ष यह है कि प्रेमचंद की जनभाषा समकालीन भारतीय समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और धरोहर की प्रमाणिक पहचान है।

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Author Biography

डी.एम. मुल्ला

एसोसिएट प्रोफेसर और अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मराठा मंडल कला, वाणिज्य, विज्ञान तथा गृहविज्ञान महाविद्यालय तथा स्नातकोत्तर केंद्र एम.कॉम. और एम.एस्सी. (केमिस्ट्री) बेलागावी ।

How to Cite

डी.एम. मुल्ला. (2025). प्रेमचंद के साहित्य में जनभाषा की सांस्कृतिक पहचान. ಅಕ್ಷರಸೂರ್ಯ (AKSHARASURYA), 8(05), 24 to 29. https://aksharasurya.com/index.php/latest/article/view/1495

References

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वही पृष्ठ संख्या 20

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वही पृष्ठ संख्या 05

रंगभूमि प्रेमचंद पृष्ठ संख्या 129 फिंगरप्रिंट पब्लिशिंग, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष

प्रेमचंद और उनके उपन्यास डॉ. उषा ऋषि पृष्ठ संख्या 164 पृथ्वीराज पब्लिशर्स, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष 1974

कर्मभूमि प्रेमचंद पृष्ठ संख्या 220 नई सदी बुक हाउस, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष 2015

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वही पृष्ठ संख्या 111

वही पृष्ठ संख्या 45