हिन्दी भाषा की मानकता को सिद्ध करनेवाले कारक

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लतीफ़ अहमद बी.
अमरीन एच.

Abstract

हिन्दी भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया और उसे स्थापित करने वाले प्रमुख कारकों का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इसमें विवेचन किया गया है कि कैसे 'खड़ी बोली' ने ऐतिहासिक विकास, व्याकरणिक स्थिरता और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त कर एक मानक भाषा का रूप ग्रहण किया। आलेख में मानकता के अनिवार्य तत्वों-जैसे ऐतिहासिकता, संहिताकरण, जीवंतता और स्वायत्तता - पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और कामता प्रसाद गुरु जैसे विद्वानों तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय की भूमिका को रेखांकित किया गया है। निष्कर्षतः, यह अध्ययन सिद्ध करता है कि मानकीकरण केवल भाषाई शुद्धि नहीं, बल्कि एक सामाजिक और प्रशासनिक अनिवार्यता है जो हिन्दी को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करती है।


 

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लतीफ़ अहमद बी.

सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग सेंट फ्रांसिस कॉलेज, कोरमंगला, बेंगलुरु |

अमरीन एच.

छात्रा, बी.कॉम. (बी.डी.ए.), पंचम सेमेस्टर सेंट फ्रांसिस कॉलेज, कोरमंगला, बेंगलुरु

References

भोलानाथ तिवारी, 'हिन्दी भाषा का इतिहास', लिपि प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 112

महावीर प्रसाद द्विवेदी, 'सरस्वती' (संपादकीय लेख), 1903-1920 के दौरान प्रकाशित विभिन्न लेख।

कामता प्रसाद गुरु, 'हिन्दी व्याकरण', नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, संस्करण 1920 (भूमिका अंश)।

धीरेन्द्र वर्मा, 'हिन्दी भाषा का इतिहास', हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, पृष्ठ 45-50

केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, 'देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण', शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, 1983

बाहरी, हरदेव, 'मानक हिन्दी व्याकरण', लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।

भारतीय संविधान, अनुच्छेद 343-351, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार।

कामता प्रसाद गुरु, 'हिन्दी व्याकरण', नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी

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