भूमंडलीकरण के दौर में आदिवासी जीवन का यथार्थ

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मनोज कुमार

Abstract

भारत तीसरी दुनिया का देश है। यहाँ अभी बहुत-सी जनसंख्या तमाम अभाव में जीवन गुजर-बसर करती है। अधिकतर जंगलों में रहने वाले जिन्हें हम ‘जनजातीय लोग’ के नाम से जानते हैं। भारत देश में कई राज्यों में आदिवासी पाए जाते हैं। उन राज्यों में प्रमुख हैं– उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, केरल, पश्चिम बंगाल में ये अल्पसंख्यक हैं, जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं जैसे– मिजोरम राज्य। आदिवासी के लिए जल, जंगल तथा जमीन ही सब कुछ है। इनके लिए ये सब जीवन जीने के आधार हैं। इनका अपना पर्व और उत्सव होता है और इनका अपना कुल देवता होता है, जिसकी ये लोग पूजा करते हैं। कुल देवता की पूजा का विधि-विधान अलग-अलग आदिवासियों का अलग-अलग होता है। भारत में इनकी कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत (10 करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासी का है।
भारत में 10 करोड़ जनसंख्या आदिवासियों की है। भारत ने संवैधानिक तौर पर 1991 से भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को अपनाया है। तब से भूमंडलीकरण ने सबसे ज्यादा आदिवासियों को नुकसान पहुंचाया है। उनके रहन-सहन, उनकी संस्कृति और सभ्यता के नष्ट होने के पीछे उपनिवेशवाद और औद्योगिकीकरण है जोकि भूमंडलीकरण के अभिन्न अंग हैं। आदिवासियों को विभिन्न प्रकार के लुभावने लालच दिखा कर उनसे उनकी जमीन हथिया लेना, उस जमीन से कीमती वृक्ष, भू-खनिज पदार्थ निकाल कर खंडहरों में तब्दील कर देना और उसे उसी अवस्था में छोड़कर चला जाना कोई नई बात नहीं है। जिसके चलते आदिवासियों का जीवन नरक में तब्दील हो जाता है। प्रगति के नाम पर सरकार का एक फैसला उनके जीवन को तबाह कर देता है।

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मनोज कुमार

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, जैन विश्वविद्यालय बेंगलुरु.

References

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