भारतीय भाषा परिवार और राष्ट्रीय एकता
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प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय भाषा परिवारों की विविधता और राष्ट्रीय एकता में उनकी भूमिका का विश्लेषणात्मक अध्ययन करता है। इसमें भारत के चार प्रमुख भाषाई समूहों (भारोपीय, द्रविड़, ऑस्ट्रिक, चीनी-तिब्बती) का उल्लेख करते हुए, भाषा को केवल ‘संप्रेषण का साधन’ मानने वाले आधुनिक व पाश्चात्य दृष्टिकोण का तार्किक खंडन किया गया है। लेखक के अनुसार, भाषा एक जीवंत संस्कृति, संस्कारों की वाहक और मानवीय अस्तित्व का आधार है। लेख में ‘भारतीयता’ को विखंडन के विपरीत एक समग्र, समावेशी और उदार जीवन दर्शन के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिकता द्वारा थोपे गए व्यक्तिवाद और अलगाववाद की आलोचना करते हुए, यह पत्र निष्कर्ष देता है कि भारतीय साहित्य और भाषा का मूल उद्देश्य समाज में विश्वास, अखंडता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है।
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References
विहित विद्या- मूल लेखक: श्री नारायण शेविरे, अनुवाद: श्री शंकर मूर्ति के एन, प्रकाशक: पुनरुत्थान सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद, २०२३