रुकोगे नहीं राधिका - राधिका की जीवन संघर्ष

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कांतराज हेच. डि

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उषा प्रियवंदा द्वारा रचित 'रुकोगे नहीं राधिका' उपन्यास पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय मानसिकता के बीच संघर्षरत नायिका राधिका के जीवन निर्वाह को रेखांकित करता है । राधिका एक आधुनिक शिक्षित स्त्री है जो सदियों पुरानी पुरुषवादी मान्यताओं को तोड़ते हुए अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है । उपन्यास में पारिवारिक विघटन, अकेलेपन और विदेशी परिवेश में भारतीय युवाओं के भटकाव को गहराई से उकेरा गया है । यह कृति आधुनिकता और भारतीय संस्कारों के मध्य सूक्ष्म द्वन्द्व, प्रतिभा पलायन के कारणों तथा परिवर्तित संदर्भों में नारी के स्वतंत्र अस्तित्व की खोज का सटीक समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करती है ।

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कांतराज हेच. डि

असिस्टेंट प्रोफेसर, पीईएस आईएएमएस, शिवमोग्गा।

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