वैश्वीकरण और हिंदी साहित्य का विकास
Main Article Content
Abstract
वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसने पूरी दुनिया को आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और सामाजिक रूप से एक साझा मंच पर ला खड़ा किया है। हिंदी साहित्य, जो भारतीय संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय अनुभवों का जीवंत दस्तावेज़ रहा है, इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य से गहराई से प्रभावित हुआ है। वैश्वीकरण ने जहाँ साहित्य को नई अभिव्यक्ति दी, वहीं परंपरागत मूल्यों के समक्ष नई चुनौतियाँ भी खड़ी कीं। यह शोध पत्र हिंदी साहित्य में वैश्वीकरण के बहुआयामी प्रभावों -भाषा, विषयवस्तु, लेखनशैली, विमर्श और संस्कृति -का विश्लेषण करता है।
Article Details
Section

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
How to Cite
References
सिंह, नामवर -छायावादोत्तर हिंदी कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005।
शर्मा, गोपीनाथ -हिंदी का वैश्विक परिप्रेक्ष्य, भारतीय साहित्य संस्थान, 2010।
रविभूषण -साहित्य और संचार माध्यम, वाणी प्रकाशन, 2012।
वजाहत, असगर -कंपनी वाला राम, राजपाल एंड संस, 2007।
पुष्पा, मैत्रेयी -अल्मा कबूतरी, राजकमल प्रकाशन, 2010।
सिंह, दूधनाथ -”नवीन कविता और विश्व चेतना”, नया ज्ञानोदय, 2008।
नागेन्द्र -हिंदी साहित्य का इतिहास, साहित्य भवन, इलाहाबाद, 2001।
कुमार अम्बुज -पृथ्वी का दुख, वाणी प्रकाशन, 2016।
पत्रिका -हंस (समकालीन अंक 2015–2023)।