AI के प्रयोग से हिंदी साहित्य में मौलिक भावनाओं पर प्रश्न चिह्न
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आज दुनियाभर के हर क्षेत्र में या हर कार्य में AI देखा जा सकता है। ऐसा कोई काम नहीं जो यह नहीं कर सकता। इसे बस कमांड देना है कि मुझे यह चित्र बना दो, मुझे इस तरह से डिजाइन बना दो या फिर मेरे यह विचार है मुझे इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कोई लेख बना दो। बस यह बताते ही काम हो गया। इसे बस बताना है यह उसे कर देगा। आज इसका प्रभाव समाज, शिक्षा, मीडिया पर तो था ही, लेकिन अब हिंदी साहित्य भी इसके प्रभाव से दूर नहीं रह सका। सवाल यह नहीं कि अब AI साहित्य में आ रहा है। सवाल यह है कि क्या यह AI हमारी मौलिक भावनाओं का स्थान ले सकता है? इसी सवाल को ध्यान में रखते हुए इस शोध पत्र के माध्यम से विभिन्न घटकों पर विचार विमर्श करने की कोशिश की गई है। यहां पर मौलिक भावना की परिभाषा, हिंदी साहित्य का निर्माण और परंपरा, AI का इस्तेमाल में संभावनाएं और समस्या, आलोचनात्मक दृष्टि और भविष्य की दृष्टि से विचार प्रस्तुति करने की कोशिश की है। अंततः सभी मुद्दों पर ध्यान रखते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि यह सहायक तो हो सकता है लेकिन वह हमारे मौलिक भावना का स्थान कभी नहीं ले सकता।
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